काशीपुर। समाज सेविका श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने मां गंगा की पवित्रता को लेकर बड़ा सवाल उठाया है जिस पर पूरे सनातन समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। श्रीमती बाली कहती है कि हरिद्वार के पावन घाटों पर प्रतिदिन उठने वाला ‘हर हर गंगे’ का उद्घोष आस्था का प्रतीक है। लेकिन, इसी आस्था के बीच बहती कचरे की धारा हमें एक गंभीर आत्मचिंतन के लिए विवश करती है।।
उक्त गंभीर विषय पर प्रकाश डालते हुए समाज सेविका उर्वशी दत्त बाली ने एक विचारणीय प्रश्न देश के सामने रखा है कि अगर गंगा हमारी माँ है, तो हम अपनी माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?
हरिद्वार में हर शाम ‘हर की पौड़ी’ पर होने वाली भव्य गंगा आरती लाखों श्रद्धालुओं के मन को शांति देती है। परंतु आरती समाप्त होते ही पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलें, थर्माकोल के दोने और रासायनिक कचरा नदी की सतह पर तैरता दिखाई देता है। समाज सेविका उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि हम जिसे पवित्र मानकर नदी में बहाते हैं, वह दरअसल माँ गंगा के लिए धीमा ज़हर साबित हो रहा है।
गंगा मां केवल जल की धारा नहीं, बल्कि हमारी जीवनरेखा है। आस्था का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। समय आ गया है कि हम पूजा के साथ-साथ स्वच्छता की भी जिम्मेदारी लें।
उर्वशी दत्त बाली के अनुसार वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि हरिद्वार के कई इलाकों में गंगा जल में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और बीओडी (BOD) का स्तर खतरनाक सीमा पार कर चुका है। इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए समाज सेविका उर्वशी दत्त बाली ने बताया कि केवल सरकारी योजनाएं जैसे ‘नमामि गंगे’ तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकतीं, जब तक हर नागरिक अपनी सोच नहीं बदलेगा।
कचरे के इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए उर्वशी दत्त बाली ने श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों से एक विशेष अपील की है। उन्होंने कहा कि घाटों पर साबुन-शैम्पू का प्रयोग बंद होना चाहिए और पूजा सामग्री में केवल इको-फ्रेंडली व जैव-अपघटनीय (biodegradable) वस्तुओं का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।उनके अनुसार, सच्ची धार्मिकता वही है जो हमारी नदियों की पवित्रता और स्वच्छता दोनों की रक्षा करे। यदि हम वाकई गंगा को माँ मानते हैं, तो हमें एक बीमार माँ की देखभाल करने वाले बच्चे की तरह उसकी सुरक्षा का संकल्प लेना होगा,
यह कहती है कि निष्कर्ष यही है की हरिद्वार की पावनता केवल पौराणिक गाथाओं में नहीं, बल्कि उसके जल के निर्मल प्रवाह में है। हमें चाहिए कि हम अगली बार हरिद्वार पहुँचकर केवल आशीर्वाद न मांगें, बल्कि गंगा मैया को स्वच्छ रखने का सच्चा संकल्प भी लें। जय मां गंगे जय उत्तराखंड









