October 30, 2026
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सुदर्शन समाचार ब्यूरो

काशीपुर। गोपीपुरा की पांडे कॉलोनी में हो रहे बाबा खाटू श्याम जी के पावन संकीर्तन महोत्सव में उस वक्त भक्ति और चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब गांव में खाटू श्याम जी के मंच से उर्वशी दत्त बाली ने बच्चों को संस्कारों और सनातन की पहचान को लेकर बताया।

कार्यक्रम में उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उर्वशी दत्त बाली ने हर माँ,ओर बहन को घर के बच्चे के माथे पर नियमित रूप से तिलक लगाने पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि तिलक केवल एक धार्मिक परंपरा या सामान्य लकीर नहीं है, बल्कि यह हमारे बच्चों के मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और सनातन संस्कृति का मजबूत रक्षा-कवच है। ये तिलक केवल लकीर नहीं, सनातन की शान और पहचान है।
​कार्यक्रम में मौजूद ग्रामीणों और श्रद्धालुओं को सीधे और आत्मीय अंदाज में समझाते हुए उर्वशी बाली ने कहा कि
​जैसे वर्दी से सिपाही और डॉक्टर की पहचान होती है वैसे ही माथे पर लगे तिलक से सनातनी की पहचान होती है। जब हमारा बच्चा तिलक लगाकर स्कूल या समाज में जाता है, तो उसके भीतर अपनी जड़ों और संस्कृति के प्रति गौरव पैदा होता है। उर्वशी दत्त बाली ने
​उपस्थित माता-पिता से अपील की कि वे अपने बच्चों को, जब स्कूल भेजती है तो नियमपूर्वक उनके माथे पर चंदन या सिंदूर का तिलक जरूर लगाए।

​और उर्वशी दत्त बाली ने बताया कि क्यों लगाना है तिलक,

तिलक केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा मनोविज्ञान और साइंस छिपा हुआ है
​आज्ञा चक्र और मानसिक एकाग्रता । भौंहों के बीच का जो स्थान ‘आज्ञा चक्र’ (थर्ड आई) और प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स जो सिर का आगे का भाग होता है। अंगूठे या उंगली से वहां हल्का दबाव देते हुए तिलक लगाने से तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय होती हैं, जिससे बच्चों की एकाग्रता और याददाश्त में उल्लेखनीय सुधार होता है।

​तनाव और क्रोध में कमी होती हैं।

माथे का मध्य भाग शरीर की प्रमुख ऊर्जा-बिंदुओं में से एक है। जब वहां चंदन या रोली लगाई जाती है, तो इसका शीतलता प्रदान करने वाला प्रभाव मस्तिष्क के तापमान को संतुलित रखता है। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा कम होता हैं।

​आत्मविश्वास और पहचान का निर्माण

जब कोई बच्चा अपनी सांस्कृतिक पहचान को गर्व से धारण करता है, तो उसके अंदर सकारात्मक का विकास होता है। माथे पर तिलक बच्चे को गलत संगत और नकारात्मक प्रवृत्तियों से दूर रहने का एक मानसिक संकेत देता है।
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जिसके दिल में भगवान, उसके पूरे होते हर काम”

अपने​ संबोधन में उर्वशी दत्त बाली ने ग्रामीणों को भक्ति के मर्म से जोड़ते हुए कहा कि भगवान को सिर्फ बाहरी मूर्तियों या मंदिरों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने हृदय में स्थान दें। मंदिर बनाना आसान है दरबार लगाने आसान है, लेकिन भगवान को अपने दिल में बसाना सबसे बड़ी बात है, प्रभु को अपने दिल में बसाओ हर जगह तुम्हारे साथ साथ रहे।
​उन्होंने कहा कि जब इंसान सच्चे मन से सब कुछ भगवान को समर्पित कर देता है और अपने मन में ईश्वर का वास रखता है, तो उसे कभी असहाय महसूस नहीं होना पड़ता।

सकारात्मक आस्था से बिगड़े हुए कार्य भी अपने आप सिद्ध होने लगते हैं।

​कार्यक्रम के अंत में उर्वशी दत्त बाली के आह्वान पर पूरे पंडाल ने हाथ उठाकर एक स्वर में संकल्प लिया कि वे अपनी नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ेंगे, हर साल गांव में खाटू श्याम जी का दरबार लगाना, और बच्चों को तिलक लगाकर सनातन परंपरा का वाहक बनाएंगे, गांव के हर घर पर झंडा लगाएंगे, ताकि बाहर की बुरी शक्ति घर में ना प्रवेश करें, बच्चों को बड़ा अफसर बना लो बहुत ज्यादा पढ़ा लो, लेकिन धर्म कर्म काम में जरूर जोड़ के रखो, इस भगवान की शक्ति से ही वह आगे बढ़ता रहेगा अपने आप, जिस घर में एक महिला पूजा पाठ करेगी उसका प्रभाव सारे घर पर पड़ेगा, और पूजा पाठ का पहला धर्म घर की महिला का ही है, एक महिला में समाज को बनाने की ताकत होती है।हारे के सहारे की जय और खाटू श्याम जी की जय के गगनभेदी जयकारों के साथ संकीर्तन का यह संदेश हर घर तक पहुंचाने की प्रतिज्ञा ली गई।

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