September 18, 2026
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सुदर्शन समाचार ब्यूरो

काशीपुर । समाज सेविका श्रीमती उर्वशी दत्त बाली जागरूकता का संदेश देते हुए कहती है कि ​हम अक्सर सार्वजनिक स्थानों की बदहाली का रोना तो रोते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि यह बदहाली किसी बाहरी ताकत की वजह से नहीं, बल्कि हमारे अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये की ही देन है।

श्रीमती बाली कहती है कि चाहे जीवनदायिनी नदियां हों या फिर हमारी आस्था के धार्मिक स्थल अथवा हमारी अपनी आवासीय कॉलोनियां या चहल-पहल से भरे बाजार गंदगी फैलाने की हमारी बीमारी हर जगह पसरी हुई है। वह कहती है कि कूड़ा साफ करने में जो ताकत और संसाधन लगते हैं, उससे कहीं अधिक आसान है हाथ में थामे कचरे को सड़क, नाली या नदी में उछाल देना। अफसोस कि हम बुनियादी नागरिक शिष्टाचार को भी भूलते जा रहे हैं।​आज स्थिति यह है कि लोग अपने घर के भीतर तो चमक-धमक रखते हैं, लेकिन घर का कूड़ा सीधे कॉलोनी की खाली जमीन, सड़क के कोने या नालियों में फेंकने में जरा भी हिचक नहीं दिखाते। ठीक यही हाल हमारे स्थानीय बाजारों का है, जहां दुकानदार और खरीदार दोनों ही सड़कों पर प्लास्टिक, पॉलीथिन और पैकिंग का कचरा फेंककर चलते बनते हैं। उर्वशी दत बाली कहती हैं कि जब तक हम कॉलोनी की सड़क और बाजार के फुटपाथ को अपनी साझा जिम्मेदारी नहीं मानेंगे और उन्हें अपने घर के आंगन की तरह साफ नहीं रखेंगे, तब तक कोई भी शहर स्वच्छ और सुंदर नहीं बन सकता।
​इस समस्या की जड़ हमारी मानसिकता में है, और इस मानसिकता को बदलने की शुरुआत हमारी युवा पीढ़ी से ही हो सकती है। समाज सेविका उर्वशी दत बाली का मजबूती से कहना है कि स्थानीय स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर केवल ‘रिवर अडॉप्शन’ (नदियों व घाटों को गोद लेना) ही नहीं, बल्कि ‘वार्ड व मार्केट अडॉप्शन’ जैसी पहल भी शुरू की जाए। इससे यह होगा कि जब छात्र-छात्राएं अपनी-अपनी कॉलोनियों, गलियों और नजदीकी बाजारों की स्वच्छता की जिम्मेदारी लेंगे, तो एक बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिलेगा।
​मनोविज्ञान भी यही कहता है कि जो सीख श्रमदान से मिलती है, वह ताउम्र दिमाग में बैठ जाती है। समाज सेविका उर्वशी दत बाली के अनुसार, जब कोई बच्चा अपने हाथों से एक बार कॉलोनी के पार्क, सड़क या बाजार की नाली के आसपास से प्लास्टिक और गंदगी हटाता है, तो उसे उस पसीने की अहमियत समझ आती है। जिस बच्चे ने खुद सफाई की हो, वह जीवन भर न तो खुद सड़क या पानी में कचरा उछालेगा और न ही अपने माता-पिता, पड़ोसियों या दुकानदारों को ऐसा करने देगा। स्पष्ट है कि
​स्वच्छता की लड़ाई केवल नगर पालिका के सफाई कर्मचारियों या चुनिंदा संस्थाओं के दम पर नहीं जीती जा सकती। समाज सेविका उर्वशी दत बाली हर नागरिक, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA), व्यापार मंडलों और स्कूल प्रबंधन का आह्वान करती हैं कि वे कॉलोनियों में नियमित डस्टबिन, बाजारों में सख्त कचरा प्रबंधन और निगरानी की व्यवस्था करें। जब हमारे बच्चे इस मुहिम की कमान संभालेंगे और बड़ों को गलत काम करने पर टोकेंगे, तभी हमारी कॉलोनियां स्वच्छ, बाजार व्यवस्थित और नदियां निर्मल व धार्मिक स्थल साफ स्वच्छ रह सकेंगे।

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